झूठ की कीमत: जब कानून का दुरुपयोग बन जाए आपकी अपनी सज़ा
"कमरे में घुप्प अँधेरा था, सिर्फ खिड़की से छनकर आती स्ट्रीट लाइट उसके चेहरे की सिलवटों को और गहरा कर रही थी। रवि ने सोचा था कि एक निर्दोष को झूठे केस में फंसाकर वह चैन की नींद सोएगा। लेकिन आज, नींद उससे कोसों दूर थी। दूर सड़क पर बजने वाली किसी भी सायरन की आवाज़ उसकी धड़कनों को रोक देती थी। अदालत में जज की वो आखिरी सख्त निगाहें उसके दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बज रही थीं— 'कानून की आँखों पर पट्टी जरूर है, लेकिन वो अंधा नहीं... और जब ये जागता है, तो झूठ की हर दीवार ढह जाती है।' उसने सुरेश के लिए एक खौफनाक जाल बिछाया था, लेकिन आज जब उसने आईने में देखा, तो उसे समझ आया कि उस जाल में फड़फड़ाता हुआ शिकार कोई और नहीं, वह खुद था। असली खौफ बाहर पुलिस की वर्दी में नहीं था, वो उसके अपने ज़मीर के भीतर से उसे घूर रहा था।"
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